Sunday, 20 November 2011

भजन(मै पनघट पर नही जाउंगी)

मै पनघट पर नही जाउंगी
मुझसे श्याम करे रे ठिठोली....
वो मुझको रस्ते मे घेरे है
और बोले तरह-तरह की बोली..
मै पनघट....

मेरा वो मटकी फ़ोड़े रे,
हमसे करे बरजोरी
जब मै उससे पिछा छुड़ाऊं
करे वो बातें कोरी-कोरी
मै पनघट पर नही जाउंगी...

उसके साथ मे ग्वाल-बाल
और हाथ मे छोटी सी बसुरिया
वे सब हमको कैसे छेड़े
जैसे कोई नन्ही सी गुड़िया
मै पनघट ...

सिर पे उसके मोरपंख है
माथ पे तिलक की रेखा
कमर मे उसके लंगोटी बिराजे
हे सखी मैने ऐसा देखा
मै पनघट ...

वो मुझको राधा-राधा पुकारे
मै कहु श्याम सलोना
वो मुझे अपनी बाहों मे लेकर
कहे राधा तुम चलो ना
मै पनघट ...

वो बासुरी कि तान सुनाकर
कहे राधा तुम नाचो
मै जब उसको मना हूं करती
सखी यह झूठ नहि साचो
मै पनघट पर ...

वो सब जगह पे मुझे मिल जाता
जहां   -जहां मै जाती
मोहन से जब मै दूर भागती
हंसी उसे तब आती
मै पनघट पर नही जाउंगी...

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-२०//१९९१,
सोमवार,रात्रि-१०.१० बजे,
एन.टी.पी.सी.दादरी,गाजियाबाद(.प्र.)
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