Sunday, 23 October 2011

तुम गज़ल की कोई किताब हो

चंचल सी अदावों वाली,
कितनी प्यारी तेरी सुरत है !
मदहोश जवानी का है नशा,
हर चाल तुम्हारी खुबसूरत है !!

तुम बैठी हो तो ऐसा लगता,
जैसे कोई मूरत हो !
तुम्हारे हिलने-डुलने का हाव-भाव,
जैसे चुलबुली कोइ शरारत हो !!

सिने से सरकता दुपट्टा तेरा,
जैसे घड़े से छलकता पानी हो !
कर मुद्रिका ऐसे-जैसे,
किसी की दी हुई निशानी हो !!

आंखे है मॄग नयनी जैसे,
तेरे भौहों का कोई जवाब नही !
हंसती हो तो ऐसा लगता,
बहती हुई शराब कोई !!

केश तुम्हारे ऐसे -जैसे,
काले पहाड़ो से गिरते झरने हो !
कानो के झुमके ऐसे,
जैसे रंग-बिरंगे सपने हो !!

हर इक अंग मे प्यार बसा,
तुम किमती -छलकती शराब हो !
कभी बुरी नजर लगने पाए,
तुम गजल की कोई किताब हो !!

चंचल सी अदावों वाली,
कितनी प्यारी तेरी सूरत है !
मदहोश जवानी का है नशा,
हर चाल तुम्हारी खुबसुरत है !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
१७/०२/२०११ ,शुक्रवार,शाम-.३० बजे,

जन शताब्दी एक्सप्रेस,दुर्ग से रायपुर रे,स्टे. के बीच मे,
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