Monday, 3 October 2011

रिश्वत तेरे कितेने रूप

रिश्वत तेरे कितन रूप,
कभी छांव व कभी धूप..

कभी मिठाई के डब्बे मे,
तू आकर हमको मिल जाता !
तुझको पाने से ऐ दोस्त,
मुर्झाया चेहरा खिल जाता !!

कभी तू मिलता ऊपहार स्वरूप में !
कभी तू मिलता चिकन व शराब के रूप में !!

कभी तू मिलता बाइक व कार के रूप में !
कभी तू मिलता घर व मकान के रूप में !!

तू जादा मिलता , नोटों के बंडल में !
कभी पत्नी के गहने व कभी उसके कानो के कुंडल में !!

कभी डोनेशन मे भी तू मिल जाता !
कभी प्रमोशन मे भी तू मिल जाता !!

कभी तू मिलता है अय्याशी में !
कभी तू मिलता है धन के राशी में !!

हे रिश्वत तेरे कई प्रकार !
बेइमानी-घूस व भ्रष्ट्राचार !!

तेरा वर्णन नही कर सके हम यार !
तुझको सलाम है बार-बार !!

रिश्वत तेरे कितने रूप........

मोहन श्रीवास्तव(कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
रचनांकन दिनांक- ०१/१२/२०००, शुक्रवार, सुबह- ४.४० बजे,

चंद्रपुर(महाराष्ट्र)

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