Wednesday, 16 November 2011

शाम

यह कैसी सुन्दर शाम
जैसे कोई स्वागत धाम
पश्चिम मे सूरज छिप रहा
मानो जैसे शरमा रहा
झर-झर करते झरनो की आवाज
जैसे मिलन हुआ हो आज

कही-कही चिड़ियों की चह-चहाहट
कही झाड़ियों के झुरुमुठ
कहीं -कहीं जोड़े बैठे हैं
वे अपने धुन मे ऐठे हैं
रौनक भरी आज की शाम
अच्छा नही लगता कोई काम

यह कैसा एकांत स्थान
चारों ओर मुस्कान ही मुस्कान
सूरज नीचे उतर रहा
चांद पूर्व से निकल रहा
अब धीरे-धिरे रजनी आई
जैसे कोई दुल्हन शर्माई

चिड़ियों की आवाज शान्त है
जोड़ों का भी चित्त शान्त है
तब तक मुझे भी आया ध्यान
मुझे भी जाना है श्मशान
कोई मुझको राह बता दे
कोई मुझे प्रकाश दिखा दे

यह कैसा प्रकृति का नियम
रोज शाम होता है स्वयम
मै अंधियारे मे भटक रहा
दूर रोशनी चमक रहा
वहां दिखती अपनी माता
काश ! वहां मै पहुच पाता...

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-३१//१९९१,रविवार,शाम६.२० बजे,

एन.टी.पी.सी दादरी गाजियाबाद(.प्र.)

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