Wednesday, 16 November 2011

दुकान


यह कैसा अपना हिन्दुस्तान
चारो तरफ़ दुकान ही दुकान,
सब अपनी पका रहे है
बेच रहे है,खा रहे है

कही लगी है दुकान राम की
कही लगी है खीर पकवान की,
जहा भी देखो वही बिक रहा
राजनिति और धर्म नाम की,

हंस हो गए कौओं जैसे
कौए हो गए हंसा जैसे
सब के हाथ मे थाली-लोटा
कौओं मे खूब लूट-खसोटा,

यदि कोई खाना देता तो
झट से थाली आगे बढ़ाते है
यदि कोई चाय का आफ़र दे
तो लोटा लेके दौड़ लगाते है,

दोनो ही हाथो मे है अशर्फ़ी
कौन पूछता है बर्फ़ी
खाते-खाते पेट फ़ुल गया
मानो जैसे सेतु बध गया,

पेट फ़ुलाए बैठे है
फ़ोन लगाए बैठे है
आ गया झट दिल्ली से काल
मानो हो गए मालामाल,

देर न लगी हो लिए तैय्यार
पत्नी से कुछ किए तकरार
पैसे लिए हजार-हजार
लगाए चश्मा आए द्वार,
कार को ले आया चालक
बैठाया मंत्री को उसमे
जैसे बैठ गया कोई बालक
गाड़ी चला दिया चालक ने
मंत्री जी लगे मूछ फ़ेरने
देने लगे मूछों पर ताव
अबकी आ जाएगा चाव

छोड़ूंगा नही किसी अफ़सर को
डाटूंगा डिप्टी मिनिस्टर को
इतने मे रुक गई कार
यह कैसा हो गया बवाल

निकले गाड़ी से मन्त्री जी
लगे पूछने पब्लिक से
यह कैसे हुआ बवाल
लगे झाड़ने वहा के दलाल

भड़काया उसने जनता को
मारो-मारो मिनिस्टर को
ये हरामी के ही पट्ठे
टोप पहन के चलते अट्ठे,

मन्त्री जी पर लगा बरसने
पत्थर चप्पल की बौछार
मन्त्री जी का बुरा हाल हो गया
अब क्या होगा दिल्ली का काल

वापस आए गाल फ़ुलाए
पत्नी बैठी पांव फ़ैलाए
ऐसी वोट कहा से पाए
मन्त्री जा सुन रोए-चिल्लाए

मोहन श्रीवास्तव
दिनांक-३०/३/१९९९१,एन.टी पी सी. दादरी,गजियाबाद(उ.प्र.)



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