Wednesday, 16 November 2011

वह कैसी होगी मेरे भाग्य की देवी (कल्पना)


वह कैसी होगी
मेरे भाग्य की देवी
उसका यमुना जैसा स्यामल शरीर
अंग-परिधान पट -चीर
मै तुम्ही सोचू दिन-रात
मेरे पूर होंगे कब सौगात
तुम्हारे हाव-भाव चाल
नयनो के रंग कैसे लाल
तुम्हारे अधरों की मुस्कराहट
जैसे देती कोई आहट
वाह तुम कितनी हसीन हो
मुझे तुम लगती गमगीन हो
कितनी अच्छी होगी तुम्हारी बातें
कब मिलोगी तुम किसी नाते
तुम्हारी रसीली मुस्कुराहट
जैसे देती कोई आहट

होगी क्या तुम ऐसी
जैसे मैं सोचता हू वैसी
तुम मेरी कविता मे समा जाओ
मेरे पास कैसे भी आओ
तुम्हारे वो रेशमी बाल
खिलते हुए वो गुलाबी गाल
तुम्हारे भी होंगे कुछ सपने
कब होंगे वो अपने

वाह यह देखो मेरी अल्पना
मै कैसी करता कल्पना
शायद मै कर गया एक भूल
मुझे लग रहा जैसे शूल
वह शूल चुभता मुझे दिन-रात
भूल कर गया मै पिछली रात
फ़िर भी एक आशा एक विश्वाश
तुम आवोगी कब मेरे पास
मै तुम्हारा कद्रदान हूं
मै तुम पर मेहरबान हूं
तुम लगती कितनी नजदीक हो
जब कि तुम बहुत दूर हो
तुम्हारे रूपो मे खोया
मै एक रात सोया
मै अब जिंदगी से हारा
कब बनोगी मेरा सहारा
मै थका उदास
लगाए तुम्हारी आस
मै बैठा तेरी राहों मे
जावो मेरी बाहों मे
वो मेरी हसीने दिल
जाओ मुझको मिल
मै हूं तेरा दिवाना
क्या कहूं मै फ़साना
फ़िर भी दर्द भरा एक एहसास
जैसे कोई अधूरी आश
अभी भी है आशा
ना होगी निराशा
तुम चाहे जैसी हो
पर तुम एक सुंदर,अति सुन्दर
निरूपाय प्रतिमा
तुम्हारे अधरों की हंसी
जैसे कोई शमा.......

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-३१//१९९१,रविवार,रात्रि ००.४५ बजे,
एन.टी .पी सी. दादरी.गाजियाबाद(.प्र.)





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