Monday, 17 October 2011

चांद बना रात का गहना

ये हरा-भरा मुस्काता जंगल,
मन को भाए दिन और रतियां !
झर-झर करते ये झरनें,
और बहती हुई देखो ये नदिया !!

सुंदर-सुंदर पेड़ों के,
फूलों पे  भौरों का मड़राना !
कू-कू-करती कोयल कि धुन,
दिल को कैसा भा जाना !!

रंग-बिरंगी चिड़ियों का,
नील गगन मे उड़ना !
मदमस्त बहारों के मौसम मे,
दिल के धड़कन का बढ़ना !!

मख-मली घास पे सो करके,
सूरज को निहारते रहना !
सुर्यास्त समय संध्या आई,
चांद बना रात का गहना !!

ठंडी-ठंडी ओस की बूंदें,
तन पे पड़ती हो जैसे बिजली !
सपनों मे अपना सुध-बुध खोकर,
मै बन गई हूं इक तितली !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक- ३०/१०/२००० ,सोमवार,दोपहर - २ बजे,

चंद्रपुर(महाराष्ट्र)



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