Sunday, 4 December 2011

क्यु आपस मे लड़ते हो

क्युं आपस मे लड़ते हो, सब मेरे भाई !
ध्यान से देखो तुम अपने को,इसमे होती है हसाई !!

एक शरीर के सभी अंग है ,काटो तो दुख होगा !
चाहे इनसे अब तक तुमने,कितना ही सुख भोगा !!

यह जीवन है थोड़ा भाई,इसे ऐसे गंवाओ !
अच्छे काम को करके ही इस अनमोल समय को बितावो !!

कितने आते-कितने जाते,कोई यहां नही रहता !
ये सब देख के फ़िर भी क्युं तु,है आपस मे लड़ता !!

मदहोश जवानी मे है अन्धा,यही है तेरा ख्याल !
पर तु भुल गया रे बन्दे,कि निकट है तेरा काल !!

गरम खुन है तेरा भाई,आज मदहोश हुआ है !
तु नही सोचे कल को अपने ,की जीवन एक जुआ है !!

इस हरे-भरे गुलशन को, युं तुम, अपने से ना काटो !
इसकी खुशुबु और सुगन्ध को,आपस मे तुम बाटो !!

गले लगा ले उनको तुम.जिससे है तेरी बुराई !
इस कागज की नाव के लिए तुम , क्यु करते हो लड़ाई !!

प्रेम भाव से मिल जुलकर,के सब मे नेक काम को कर लो !
प्यार की ज्योति जला कर ,सब मे, नीच काम को हर लो !!

मोहन की है बिनती तुमसे,दिल से इसे स्वीकारो !
कभी मारना है यदि किसी को, तो मोहन को पहले मारो !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
१९//१९९४ ,सोमवार ,रात्रि ,१२.१५ बजे,
चन्द्रपुर (महाराष्ट्र


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