Thursday, 8 March 2012

जनता की जेल

भारत माता के वोटों के लाल,
अब अपनी निद्रा दूर करो !
इस डरी हुई सहमी जनता को,
और अधिक ना मजबुर करो !!

वादे जो-जो- किए थे तुमने हमसे,
उससे तुम ना मुकर जावो !
सत्ता की अन्धी दौड़ मे तुम कहीं,
देश  की राह से ना भटक जावो !!

दुनिया के देशों को देखो,
जो आगे दर आगे बढ़ रहे है !
पर हम आपस मे लड़कर,
उनसे और पिछड़ रहे है !!

व्यक्तिगत हितों को भुला करके,
अब भारत के हित की सोच करो !
आर्थिक, सामाजिक,बैग्यानिक क्षेत्र मे,
तुम तरह तरह के खोज करो !!

इस देश कि भोली जनता के दिलों से,
और अधिक ना खिलवाड़ करो !
वोटों का खेल अभी रहे हो खेल,
पर जनता की जेल से मगर डरो !!

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
१७//१९९९,शनिवार,रात्रि, बजे,

चन्द्रपुर,महा.


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