Saturday, 4 May 2013

निंदक व आलोचक को




हम जिस भी काम को करते हैं,
उनमे श्रद्धा पूरी ईमानदारी हो
आती हैं मुश्किलें तो आने दो,
हम कभी भी इससे दुखियारी हों

किसी काम को करते हैं तो,
हम हर बार सफल हैं नही होते
असफलता कभी जब मिलती है हमें,
तो दुःखी हो करके हम रोते

पर असफलता ही सफलता की है सीढ़ी,
ये अपने दिल मे ध्यान रहे
आलोचना से हमे मिलती है शक्ती,
जो कमी हो उसमे सुधार करें

निंदक आलोचक को,
अपने पास सदा रखें
उनकी टीका-टिप्पणियों से,
हम अपने मे और सुधार करें

सच्चे अर्थों मे आलोचक,
वे एक गुरु से कम हैं नही
जिनकी बस आदत कमी ढूढ़ना,
तब हम काम हैं करते और सही

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
२२--२०१३,सोमवार,१२.१५ बजे,

पुणे,महा
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