Saturday, 19 November 2011

आलसी ईंषान


मै हु एक आलसी ईंषान
करता कल्पनावो मे उची उड़ान
ऐसे ही दी हमने अपनी जिन्दगी गुजार
याद आती वो भुले बार-बार
मै एक जगह लेटे-लेटे
दिन बिता दिया करता
और गप्पे मार-मार कर
पेट को भर लिया करता
मुझे उस समय कुछ न सुझता
आगे जिवन के बारे मे
कि है बहुत से काम को करने
बरसात-गर्मी या जाड़े मे
मेरी केवल एक ही चिन्ता
पेट कैसे भी भर जाए
और नही किसी काम से मतलब
चाहे दुनिया मर जाए
कुछ दिन बाद हुई मेरी शादी
हुए पाच-छह बच्चे
वे कितने भोले-भाले थे
और बहुत थे अच्छे
मै उनके लिए कुछ कर न सका
वे रहते भुखे-भुखे
मेरी पत्नी कुछ ला कर देती
वे खा लेते रुखे-सूखे
भूख से व्याकुल हो करके
चार ने प्राण दिए त्याग
मेरी पत्नी और दो बच्चे
अपने से लगा लिए आग
मै हू उनके मॄत्यु का कारण
और उनका हत्यारा बाप
मै अपनी आलस्यता से ही
किया बहुत ही घोर पाप
मै अब अपना सब कुछ हारा
एक आलसी ईंषान बनकर
मेरा गला घोट दी होती
मेरी मा मुझे जनने पर
मै एक पापी बूढ़ा हू
इधर-उधर भटक रहा हू
मुझे मॄत्यु नही है आती
इसी भवर मे अटक रहा हू
मै सीख दे नहि सकता यारों
मै मूरख अग्यान
तुम आलस्य को छोड़कर प्यारो
बनो महान ईंषान
अभी बहुत सा समय है बाकि
उठो अपनी मा के सन्तान
अभी से तुम दॄढ़ संकल्प को कर लो
कि हम बनेंगे महान ईंषान
तुम्हारी सफ़लता कदम चूमेगी
देगी तुम्हे दुवाए
अब तुम आलस्य को त्याग करके
पूर्ण करो अपनी इच्छाएं..

मोहन श्रीवास्तव
दिनांक-०१/०५/१९९१ ,वुद्धवार ,शाम ४.३७ बजे,
एन.टी.पी.सी. ,दादरी ,गाजियाबाद(उ.प्र.)

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