Saturday, 19 November 2011

शादी या फ़ासी का फ़ंदा


मै अपनी किस्मत पे परेशान हु
तुम्हारे लिए मै हैरान हू
अभी मै अकेला कोई न सहारा
हमारे लिए तुम बनोगी क्या किनारा
जब से मेरी शादी की चर्चा हुई है
मेरी जिंदगी गम मे डुबी हुई है
मुझे लग रहा है ये फ़ासी का फ़ंदा
तुम्हारे लिए मै क्या करुंगा धन्धा
मै अब तक कुछ बन नही पाया
मै दुसरो के लि कुछ कर नही पाया
मै देश दुनिया को देखकर
घबड़ा रहा मै ये सोचकर
नित नई होगी तुम्हारी वो मागे
शायद मै पुरा करु नही वादे
मै उन कांटो मे कैसा फ़स रहा
मुझे देखकर सारा जग हस रहा
मेरी तुमसे एक ही आरजू है
कि हम मिल-जुलकर खेएंगे नइया
तुझे भी किनारा मुझे भी किनारा
मिट जाएगी सब गम की ये दुनिया
मै अपनी किस्मत पे परेशान हू
तुम्हारे लिए मै हैरान हु...

मोहन श्रीवास्तव
दिनांक-१८/५/१९९१ ,रात्रि -१.३६ बजे,शनिवार,
एन.टी.पी.सी. दादरी ,गाजियाबाद(उ.प्र.)

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