Saturday, 15 October 2011

हो अपना चमन इस धरा पे ऐसा


हो अपना चमन इस धरा पे ऐसा ,
जहां नफ़रत की कोइ दीवार न हो  !
ईंसानियत भरा हो जन-जन मे ,
जहा हिंसा व अत्याचार न हो !!

फ़ूलों की तरह सभी मुस्काते रहें,
जहां दुख के न कोइ आंसू हों !
प्यार-दुलार से रहे सभी ,
जहां खुशियों के छलकते आंसू हों !!

आदर-सम्मान सभी को मिले ,
जहां ऊंच-नीच का कोइ भेद न हो !
जातियता का कोइ बन्धन न हो ,
और ईंसानियत एक बस मजहब हो !!

जीव-जन्तु या कोइ भी प्राणी,
सब को जीने का अधिकार हो !
सभी जीवों पर दया करो ,
यह सबके दिल की पुकार हो !!

हर उत्सव मनाएं सब मिल-जुल के,
जहां खुशियां ही खुशियां हो !
हर सुबह एक नई सुबह हो ,
जहां धूप -छांव की बगिया हो !!

मोहन श्रीवास्तव
दिनांक-१६/०५/२००० ,मंगलवार ,शाम ६.५५ बजे
चंद्रपुर (महाराष्ट्र),

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