Monday, 28 November 2011

देखो सावन-सावन

देखो सावन-सावन,ॠतु ये सुहावन
कैसा ये प्यारा लगे
वो मेरी दुलारी तुम प्राणो से प्यारी
तेरा गुस्सा सुहाना लगे

झुले पड़े चारों ओर,चाहे देखो जिस ओर
डाली कैसे ये हिलने लगे
आओ झुलें हम साथ,करे बहुत सी बात
मेरे दिल अब मिलने लगे

जहां देखो हरियाली,खुश हो रहे माली
कलियां मुस्कराने लगी
धिरे चले रे पवन,कारे बादरों के संग
पानी रिम-झिम बरसाने लगे

सुरज कभी उग जाय और कभी छिप जाय
खेल लुका-छिपी करने लगा
घटा घेरे घनघोर करे आपस मे शोर
मेरा मन अब डरने लगा

मेरी लाडली तुम,मै तुम्हारा सनम
मै कब से आहें भरुं
अब तो तुम मान जावो.मुझे ऐसे ना सतावो
तुम जो कहो वैसे मै करुं

कितनी नखरे वाली,तेरे होठों पे लाली,
तेरे हसने से फ़ूल खिल जाय
तेरा गोरा बदन जैसे शिशे का तन
तेरी चाल पे सब मर जाय
देखो सावन-सावन..............

मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-//१९९१ ,शुक्रवार, रात, १०.२० बजे

एन.टी.पी.सी.दादरी ,गाजियाबाद (.प्र.)
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