Monday, 28 November 2011

कर्ज़


जिसके उपर है कर्ज
उसको बिना दर्द का मर्ज
उसे दुखी कर रहा दिन रात
जाड़ा-गर्मी या बरसात
वह शर्म से हो रहा लाल
मत पुछो उसके दिल का हाल
उसको चिन्ता लगी सताने
सभी मारते उसको ताने
वह सबको सहता रहता
कभी किसी से कुछ न कहता
भुख प्यास लगती नही उनको
नीद नही आती है उनको
क्र्ज लेना महान पाप
इससे पाते सब सन्ताप
लेकिन मजबुरी मे लेते कर्ज
कर्ज लेकर करते अपना फ़र्ज
वे करते कर्ज चुकाने के वादे
उनके होते नेक ईरादे
पर कभी कभी समय गुजर जाता
उनके समझ मे कुछ न आता
वे करते बहुत काम
उनसे रुठे रहते राम
उनके पैसे वक्त पर नही मिल पाते
वे पैसो के खातिर बार बार जाते
लोग सोचते ते करता बहाना
वह कह न सकता दिल का फ़साना
फ़िर भी किसी तरह से कर्ज चुकाता
वह इस मापाप से मुक्ती पाता
इसीलिए जितना चादर
उतना ही पाव फ़ैलावो
कर्ज उतना ही लो
जितना की दे पावो

जिसके उपर है कर्ज
उसको बिना दर्द का मर्ज.........

मोहन श्रीवास्तव
दिनांक-८/९/१९९१ ,रविवार ,शाम ,५.२० ,बजे,
एन.टी.पी.सी.दादरी ,गाजियाबाद (उ.प्र.)
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