Friday, 18 November 2011

ईद


आज ईद का है आलम
सभी सजे है जैसे शबनम
चारो तरफ़ खुशी है
कैसी ये हंसी है
सभी गले रहे है मिल
कितने हसीने दिल
आज कितना है इनमे प्यार
जैसे सावन की हो बहार
ये नन्हे-मुन्ने बच्चे
लगते है कितने अच्छे
इन्हे मिल गए बहाने
खुशी के नही ठिकाने
मै भी ईदगाह जाता
मिल के सभी से आता
पर ये दोनो मेरे पैर
मुझसे ये लेते बैर
मै कही जा न सकता
मै कही आ न सकता
मेरा ऐसा कहा नसीब
मै हूं कैसा बदनसीब
मेरा खुदा है मुझसे रूठा
मै हर चीज से हू टूटा
मै रात-दिन उसे पुकारूं
आकर मुझे उबारो
कैसी ये गरीबी
मेरी कितनी बदनसीबी
सभी हसते होंगे मुझ पर
ताने कसते होंगे हम पर
पर ये मिलन का आलम
मुझे हजार खुशिया देते..

मोहन श्रीवास्तव
दिनांक-१७/४/१९९१
एन.टी.पी.सी. दादरी गाजियाबाद(उ.प्र.)
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