Friday, 18 November 2011

तूफ़ान या मंहगाई


चल रहा कैसा तूफ़ान
जैसे कोई एक शैतान
इससे हुए सभी परेशान
सब को करे यह परेशान
इसे शर्म और नही है लाज
बेदर्द बन गया है ये आज
इस शैतान के अनेको रूप
सर्दी गर्मी या हो धूप
इसके आगोश मे जो आ जाता
वह मुश्किल से ही बच पाता
साथ मे ले कर चल रहा धूल
धूल चुभ रहा जैसे शूल
रह-रह के ये फ़ुफ़कार मारता
रुक रुक कर यह हूंकारता
जैसे कोई जहरीला साप
करने चला हो कोई पाप
इससे सभी हुए है त्रस्त
पर यह अपनी धुन मे मस्त
बरसात मे ये जोशिला बन जाता
सर्दी मे रोबिला बन जाता
पर गर्मी मे जहरीला बन जाता
इसका मार सहा नहि जाता
गर्मी पड़ती अधिक तेज
मैने सजाई थी फ़ूलो की सेज
सहसा आया यह शैतान
सेज को  कर दिया श्मशान
मेरे थे कितने अरमान
पर रह गए वो सूनसान
सब कर गया यह बर्बाद
रह रह कर ये आए याद
रह रह कर ये आए याद...

मोहन श्रीवास्तव
दिनांक-१७/४/१९९१
एन.टी.पी.सी.दादरी गाजियाबाद(उ.प्र.)
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