Friday, 18 November 2011

सवाल


मध्य रात्रि का पहर
इस छोटे से शहर मे
चांद अस्त हो रहा पश्चिम मे
तारे करते झिलमिल-झिलमिल
मै भी आज एकांत चित्त
चाह रहा हू सोने को
पर नै बहुत परेशान हू
कुछ सोच रहा हू लिखने को
चारो तरफ़ है साय-साय
कुत्ते भोके भाय-भाय
सब दिन भर के थके हारे
सभी सो रहे है बेचारे
श्वाश ले रहे जोर-जोर
नाको से इनके उठते शोर
ये सुबह उठेंगे
बनाएंगे खाना
खाना खा कर
इन्हे होगा काम पर जाना
मै भी सोचता हू
कि मुझे भी सुबह उठना है
बाकि बचे है बहुत काम
उनको भी पूरा करना है
पर मै आज हू बहुत उदास
जैसे कोई अधुरी आश
मेरा यह कैसा जिवन
जिसका नही कोई सिद्धान्त
मै क्या-क्या सोचू दिन-रात
नही है मेरे सोचने का अन्त
मेरी कल्पनाएं है अपार
जैसे रेत की दीवार
मै सोना चाह रहा
पर नही मिलती कामयाबी
मेरी कैसी है ये किस्मत
कैसी लगेगी इसमे चाबी
मुझे अपने पर नही विश्वाश
कि मै हौंगा कामयाब
मै दूसरो पर लगाता आश
ऐसे मेरे है हालात
मेरी किस्मत को बनाने वाले वो खुदा
तू मेरे सब कुछ ले-ले
मुझे नीद के बदले
अब मौत की भीख दे दे
ओ मेरे मालिक
तुम हो मेरे सुहाने सफ़र
मेरे मइयत को
तू दो गज कफ़न दे दे
मेरी कमली वाले
मेरी यही है तुझसे मिन्नत
मुझे मारने वालो को
मेरी दुआएं देना
वो जिन्दगी देने वाले
तुझसे है सवाल आखिरी
तुम्हे जब मारना ही था तो
जिलाया किसलिए

मोहन श्रीवास्तव
दिनांक-२०/४/१९९१
एन.टी.पी.सी.दादरी, गाजियाबाद(उ.प्र.)
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