Friday, 18 November 2011

फ़सल की कटाई


ये किसानो के है खेत
फ़ागुन गया आ गया चैत
इनको चिन्ता लगी सताने
कैसे कटेंगे मेरे खेत
इनकी नींद गई आखो से
खाने कि भी फ़िकर नही
सिर्फ़ फ़सल काटने की चिन्ता
किसी बात की जिकर नही
फ़सल पक गए सारे
गेहू की झूले बाली
चिड़ियों के भी झुण्ड लग रहे
चूंग रहे उसकी डाली
हो रहा कितना नुकसान
लग नही रहा अनुमान
लग गए काटने फ़सल किसान
तपती धूप लगे मशान
सुबह भोर होते ही
ये चल दिए अपने खेतो की ओर
बाल-वॄद्ध-युवा-औरत
सभी कर रहे है शोर
गाते-गाते काट रहे है
चाहे कितनी पड़े धूप
प्यास से व्याकुल हो करके
पिते सब पानी के घूट
सुबह चल देते सब
अपने-अपने खेतो के पास
वही सभी रोटी खाते
तथा बुझाते अपनी प्यास
शाम को सभी लौटते
अपने खेतो से घर की ओर
सभी थके हारे
अपने सर पर रखकर बोझ
भुख से तड़पते बेचारे
खाते और लेट जाते
कुछ भजन करते-करते
सपनो मे खो जाते
वे कितने महान
मेहनत करते दिन-रात
पर वे हमसे सुखी है
सर्दी गर्मी या हो बरसात
धरती माता को सिचते वे
अपने खुन पसिने से
 बहुतो को आराम मिल रहा
उनके खुन को पिने से...

मोहन श्रीवास्तव
दिनांक-२०/४/१९९१
एन.टी.पी.सी.दादरी ,गाजियाबाद(उ.प्र.)
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