इस जहां से न्यारी तुम हो प्रिये,
हर चाल तुम्हारी खुबसुरत है ।
सब चाहते हैं तुम्हे पाने के लिये,
जैसे उन्हे तुम्हारी जरुरत है ॥
खिलते गुलाब के फुलों की तरह,
रूप तुम्हारा तुम्हे कहूं ।
बातें करती पिपल पत्ते की तरह,
करती हो ईशारा तुम्हे कहूं ॥
आम की अमराई जैसे,
लगता है बौराई तुम्हे कहूं ।
अमलतास के फुलों की तरह,
लगता है गदराई तुम्हे कहूं ॥
साड़ी मे लिपटी हुई तुम्हे,
धरती की हरियाली तुम्हे कहूं ।
मुस्कान तुम्हारी है ऐसी,
जैसे फुलों की क्यारी तुम्हे कहूं ॥
गन्धराज की खुशबु लिये तुम,
और सीना अनार का तुम्हे कहूं ।
हर- श्रींगार के फुलों की तरह,
आसूं की धार मै तुम्हे कहूं ॥
तुम छुई-मुई के पौधे की तरह,
लगता है शर्माई तुम्हे कहूं ।
बेला-चमेली के फुलों जैसे,
कोई परी हो आई तुम्हे कहूं ॥
इस जहां से न्यारी तुम हो प्रिये,
हर चाल तुम्हारी खुबसुरत है ।
सब चाहते है तुम्हे पाने के लिये,
जैसे उन्हे तुम्हारी जरुरत है ॥
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनांक-१५-३-२०१३,शुक्रवार,
रात्रि ९ बजे, पुने महा.
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