ये दिल है कोई पत्थर तो नही,
जो हर मुश्किल को सहता रहता है ।
दुख-सुख, छांव व तपती धूप,
हर राह से गुजरना पड़ता है ॥
तीर सी चुभती तिखी बातें,
व उनके हाव-भाव दुख देते हैं ।
हर रात अमावश की रातें,
जो रह-रह के डर से देते हैं ॥
मुस्कान है कितनी ज़हरीली,
आखों मे नफ़रत दिखती है ।
साथ रहे हम हर पल उनके,
पर पहचान नही हमे अब मिलती है ॥
खाये थे कसम तब हम दोनो,
जींदगी हम साथ बिताएंगे ।
कैसा भी समय आये अपना,
पर हम कस्मे-वादे निभाएंगे ॥
पर कुदरत को कुछ और मंजूर ही था,
जो पल भर मे सब कुछ तबाह हुआ ।
मेरे लिये उनका बद्दुआ ही सही,
पर उनके लिये मेरा हर पल है दुआ ॥
पर उनके लिये मेरा हर पल है दुआ ॥
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
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१०/४/२०१३,वुद्धवार,सुबह -११.५० बजे,
पुणे महा.
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