मेरा ये अपना जीवन ,मुझे कैसा लग रहा है !
सारा जमाना हमको लगता है ठग रहा है !!
ये कैसा नसीब मेरा जिसे चाहता न मिलता !
मैने पाया फ़ूल ऐसा ,जो कभी नही है खिलता !!
मेरे सिधे पन का मतलब,लोगों ने गलत समझा !
आदर के बदले मुझको,निरादर मिला है सब से !!
मेरा दिल है जलता रहता,किससे करुं मै बातें !
मै रात-रात जग के,बिताते रहे है रातें !!
हम आज अपनी किस्मत से, परेशान हो रहे हैं !
दुनिया के ढंग से हम, हैरान हो रहे हैं !!
मेरा अपना प्यारा जीवन, बर्बाद हो रहा है !
मुझे हर तरफ़ अंधेरा ,अन्धेरा ही मिल रहा है !!
मै जिस जगह पे जाऊं,मेरा कोई नही है सुनता !
मै जिस किसी को चाहूं,मुझे वो नही है मिलता !!
गरीबों से हमको अपना,भरपूर प्यार मिलता !
ईंसानियत का हमको ,उनसे ही ग्यान मिलता !!
मै हो गया हुं नर्वश,मुझे रास्ता न मिलता !
कोई मुझे बता दो मेरी, मंजील है कहां पर !!
मेरा ये अपना जीवन...................
मोहन श्रीवास्तव (कवि)
www.kavyapushpanjali.blogspot.com
दिनां-२७/९/१९९१ ,शुक्रवार ,शाम -६.५० बजे,
एन.टी.पी.सी.दादरी ,गाजियाबाद (उ.प्र.)
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